Description
भारतवर्ष की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करने में संस्कार गीतों की सराहनीय भूमिका है। भोजपुरी एवं असमीया समाज में यज्ञोपवीत, विवाह आदि के अवसर पर देवी-देवताओं से संबंधित मांगलिक गीत गाए जाते हैं। इन अवसरों पर ‘पितृ-निमंत्रण’ नामक एक लोकाचार किया जाता है जो दोनों ही समाजों में प्रचलित है। इन अवसरों पर पीतरों को पिण्डदान करने की प्रथा भी दोनों ही समाजों में प्रचलित है। गया (बिहार) में पिण्डदान करने की पौराणिक सत्यता का उल्लेख भोजपुरी एवं असमीया दोनों ही संस्कार गीतों में हुआ है। शादी के अवसर पर वर-वधू का ग्रंथि-वंधन करना, अग्नि परिक्रमा करना, नख काटना, पैर रंगाना आदि ऐसे लोकाचार हैं, जो दोनों ही संस्कृतियों में पूर्णरूपेण एवं एक समान पालन किए जाते हैं। संस्कार गीतों केमाध्यम से दोनों ही समाजों में ये लोकाचार समान रूप से परिलक्षित होते हुए मानो प्राचीन भारत की सांस्कृतिक एकता की कहानी कह रहे हो।
भारतीय संस्कृति को सनातन संस्कृति माना गया है। इसकी जड़ें जितनी ही प्राचीन हैं उतनी ही वैज्ञानिक भी। युग के बदलते हुए परिवेश में उनकी व्याख्या एवं उपमान भले ही बदल जाए, परन्तु सिद्धान्त नहीं बदल सकते। आज के परिवर्तित युग में भी भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धान्त यही हैं, किन्तु उनके वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए हमें प्राचीन रूप का अध्ययन करना अत्यावश्यक है। भारतीय संस्कृति के साथ संस्कारों का बहुत ही गहरा सम्बन्ध रहा है। जन्म-पूर्व से लेकर मृत्यु पर्यन्त भारतीय मनीषियों ने जिन सोलह संस्कारों की प्रतिष्ठा की है। वे भारतीय संस्कृति को सबल बनाने में आधार स्तम्भ का कार्य करते हैं। भारतीय संस्कृति के साथ इन संस्कारों के जुड़े रहने के कारण ही विश्व-संस्कृति में भारतवर्ष का सर्वोच्च स्थान है, क्योंकि विश्व के किसी भी देश में संस्कारों का इतना वैज्ञानिक अवतरण नहीं हो पाया है जितना कि भारतीय मनीषियों ने किया है।







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