Description
प्रस्तुत पुस्तक व्यंग्य की पूरी परंपरा को समझने की मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत करती है। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक नामचीन साहित्यकार एवं व्यंग्यकार हुए हैं, उन सबको इस किताब में जगह दी गई है। हरिशंकर परसाई को प्रस्थान बिंदु मानकर उक्त पुस्तक की आलोचकीय-दृष्टि से विश्लेषण किया गया है। इसके साथ ही ‘तबादला’ (विभूतिनारायण राय) एवं ‘बारामासी’ (ज्ञान चतुर्वेदी) के उपन्यासकारों के रचना-व्यक्तित्व का चित्रांकन करते हुए दोनों कृतियों में उपजे व्यंग्य की गंभीरता, उसमें निहित कार्यालयों के दफ्तरी चालबाजी, राजनीतिक एवं सामाजिक-चिंता का तार्किक-रूप से मूल्यांकन किया गया है।
यह किताब आप लोगों के हाथों में है। लेखक ने पूरी ईमानदारी के साथ विषय के साथ न्याय किया है। फिर भी रचनाकार के ज्ञान की अपनी सीमा है। यदि कोई तथ्य/विचार छूट गए हों अथवा भूलवश किसी अंश के साथ लेखक न्याय नहीं कर पाया है तो आप लोगों के आलोचकीय सुझाव का स्वागत है।







Zohar (verified owner) –
Good service.
Julian (verified owner) –
The product is firmly packed.
Alan (verified owner) –
Very fast delivery.
Matthew (verified owner) –
Very well worth the money.
Alan (verified owner) –
The product is firmly packed.
Angel (verified owner) –
Very well worth the money.