Description

मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान सहजतापूर्वक प्रवेश कर गया है, यह प्रायः सर्वविवदित है। मनोविज्ञान की एक विस्तृत शाखा के रूप में समाज मनोविज्ञान ने इतनी प्रगति की है कि मानवीय व्यवहार का कोई भी पक्ष अब अछूता नहीं रहा है। जीवन में विभिन्न परिस्थितियों एवम् प्रवृत्तियों के संदर्भ में चाहे वो व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवम् राजनीतिक ही क्यों न हो, मानवीय व्यवहारों में विविधता एवं जटिलता दिखाई देती है। वत्र्तमान संदर्भ में
जहाँ तकनीक ने अथाह प्रगति कर ली है, उसके व्यवहार एवं प्रवृत्तियों को समझना समाज मनोविज्ञान की सहायता के बिना समझना कठिन है। अतः समाज मनोविज्ञान का अनुशीलन तथा अध्ययन जीवन तथा मानवीय व्यवहार को समझने के लिए कितना उपादेय है यह कहने की आवश्यकता नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक की रचना में हम लेखक द्वय का कोई इतना व्यापक उद्देश्य तो नहीं रहा परंतु समाज मनोविज्ञान के विविध पक्षों को वत्र्तमान विश्व विद्यालयों के छम्च् के संदर्भ में निर्धारित पाठ्यक्रमों के अनुरूप छात्रों के लिए सरल तथा सुबोध भाषा में प्रस्तुत करने की ओर हमारी दृष्टि अवश्य रहीं है। प्रत्येक अध्याय को लिखने में विद्यार्थियों के समझ के स्तर एवं उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया है। साथ में, लेखक द्वय ने इतना ध्यान भी अवश्य रखा है कि शास्त्रीय शब्दों और भाषा के प्रयोग में उतनी गंभीरता बनी रहे ताकि मनोविज्ञान की शास्त्रोचित मर्यादा का निर्वाह यथा संभव हो सके। हम लेखक द्वय रामदयालु सिंह महाविद्यालय के स्नात्कोत्तर मनोविज्ञान विभाग में सहकर्मी के रूप में स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्रों के अध्यापक क्रम में उनकी कठिनाईयों से प्रेरित हो कर उन्हीं को दृष्टि बिंदु में रखकर इस पुस्तक की रचना करने का प्रयास किये हैं।
यह पुस्तक 13 अध्यायों में विभाजित है। पुस्तक के अंत में सभी अध्यायों से संबंधित उदाहरणस्वरूप वस्तुनिष्ठ, लघुउत्तरीय एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न दिये गये हैं जो विभिन्न विश्व विद्यालयों में स्नातक स्तरीय परीक्षाओं के लिए सर्वथा उपयोगी है।

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