Description
महिला स्वास्थ्य और मातृत्व सुरक्षा पर केंद्रित अध्याय पुस्तक को मानवीय संवेदना से जोड़ता है। इसमें मातृ मृत्यु दर, कुपोषण और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं को आंकड़ों और उदाहरणों से स्पष्ट करते हुए ’जननी सुरक्षा योजना’, ’प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना’ तथा ’आयुष्मान भारत’ जैसी सरकारी योजनाओं के योगदान और सीमाओं का विश्लेषण किया गया है। महिलाओं के स्वास्थ्य को केवल शारीरिक पहलू तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे शिक्षा, सामाजिक स्थिति और आर्थिक सशक्तिकरण से भी जोड़ा जाना चाहिए। भारतीय सामाजिक मुद्दों के अतिरिक्त पुस्तक में नेपाल के रणाओं के शासनकाल में हुए सामाजिक सुधारों रेखांकित करते हुए समाज में व्याप्त कुरीतियों, सामाजिक विभेदों और रूढ़िवादी परंपराओं को विस्तार से वर्णित किया गया है। साथ ही यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार धीरे-धीरे शिक्षा, सुधार आंदोलनों और लोकतांत्रिक चेतना के माध्यम से नेपाल ने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाए। इन सुधारों का मूल्यांकन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करते हुए लेखक ने बताया है कि लोकतंत्र की स्थापना और सामाजिक चेतना का विकास एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है, जिसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी आवश्यक है। स्ंापादित पुस्तक के अंतिम अध्याय में दिव्यांगजनों की स्थिति पर गहन विमर्श किया गया है। इसमें उनकी प्रमुख समस्याओं, सामाजिक उपेक्षा, रोजगार की कठिनाइयों तथा सामाजिक समावेशन में आने वाली चुनौतियों को विस्तृत रेखांकन के साथ ही सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा दिव्यांगों की सामाजिक एवं आर्थिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए किए गए प्रयासों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया है। साथ ही, दिव्यांग व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने हेतु आवश्यक नीतिगत सुधारों और संवेदनशील दृष्टिकोण पर भी बल दिया गया है।
यह पुस्तक भारतीय समाज के समग्र अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी है, जो पाठकों को सामाजिक संरचना, असमानताओं, सुधार आंदोलनों, मानवाधिकारों, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरणीय चुनौतियों को गहराई से समझने का अवसर देती है। समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान और सामाजिक कार्य से जुड़े शिक्षाविदों और शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकती है। इसके माध्यम से स्पष्ट होता है कि जब तक महिलाएँ, दिव्यांगजन और वंचित वर्ग समान अधिकारों और अवसरों के साथ समाज की मुख्यधारा में सक्रिय भूमिका नही निभाएंगे तब तक किसी भी राष्ट्र की प्रगति संभव नही है । यह पुस्तक सामाजिक जागरूकता और परिवर्तन की दिशा में एक सार्थक योगदान है।







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